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आज के अभिभावक अपने बच्चों को आगे बढाने के लिए तो हर संभव सुविधायें प्रदान करते हैं, लेकिन उन्हें नैतिक मूल्य और संस्कार देने की तरफ उनका ध्यान कम ही होता है, एक समय था जब संयुक्त परिवारों की गहन परम्परा इस देश में रची बसी थी, हर बच्चा होश संभालने पर अपने आसपास दादा-दादी के रूप में ऐसे स्नेहिल बुजुर्गों को देखता था, जिनकी सुबह पूजा पाठ से होती थी।
हाथ में रामायण या गीता रखने वाले इन बुजुर्गों को अगर संस्कारों की पाठशाला कहा जाये तो गलत नहीं होगा, जीवन में त्याग स्नेह और द्यढ चरित्र की क्या महत्ता होती है, यह बात इन बुजुर्गों से बखूबी सीखी जा सकती थी, आज के दौर में भौतिक सुख सुविधाओं में जरूर अप्रत्याशित वृध्दि हुई है, लेकिन मानव मूल्य और संस्कार तेजी से कम हुयें हैं।
दरअसल आगे बढने की होड में व्यक्ति जिन चीजों को बाधा समझकर पीछे छोड देता है, वही आगे जाकर उसके गले का फंदा बन जाती हैं, हमारे आसपास की दुनिया इन दिनों कुछ इस कदर रफ्तार पकड चुकी है कि सभी के पास आज समय का बेहद अभाव है, समय नहीं होने की वजह से यह दौर इंस्टैट काफी की तरह हो गया है, यानी जो कुछ करना है तुरन्त करना है।
यही वजह है कि इस दौर में संस्कार और आचार व्यवहार के तौर तरीके भी किसी डिब्बाबंद खाद्य सामग्री की तरह बाजार में उपलब्ध हैं, युवा पीढी को बिगडैल घोडों का हुजूम कहने वालों को यह बात नहीं भूलनी चाहिये कि अगर इन घोडों पर मूल्य और संस्कारों की लगाम कसी जाती तो ये नायाब घोडे साबित होते।
आज भी युवा पीढी के कई ऐसे प्रतिनिधि नजर आते हैं, जिनका मूल्य और संस्कारों से गहरा रिश्ता है, और इसी वजह से वह सह अस्तित्व के महत्व को भी अच्छी तरह समझते हैं, बच्चे जब छोटे होते हैं तब अभिभावक यह बात आसानी से सोच और कह पाते हैं, कि उनकी बच्चों से कोई अपेक्षा नहीं है, वे सिर्फ उनके बेहतर जीवन की कामना करते हैं।
लेकिन वृध्दावस्था की सांझ जब घिरती है तो फिर उन्हें अपने ही याद आते हैं, इन हालात में अगर महानगर या विदेश में रहने वाला बच्चा फोन करने से कतराये तो किसी माता-पिता की क्या हालत हो सकती है इसे बखूबी समझा जा सकता है, बच्चों का भविष्य संवारने और उसे जीवन की हर सुख सुविधा देने का संकल्प अच्छी बात है, लेकिन इसके साथ ही उसे संस्कारों की पाठशाला में जीवन मूल्यों का पाठ पढाना भी जरूरी है।
ये मूल्य जिन्दगी के उतार चढाव में संजीवनी बूटी का काम करते हैं, जीवन का हर पल चुनौती है जिसका जवाब बंदूक, धन, नाराजगी और निराशा से नहीं दिया जा सकता है, इन परिस्थितियों में यही मूल्य और संस्कार व्यक्ति को मुश्किलों को पार ले जाते हैं, क्योंकि इनमें धैर्य और धर्म का पाठ छिपा है, कोशिश करियें कि बच्चों में बचपन से ही संस्कार और मूल्यों का क्रमिक विकास हो।
जीवन की चुनौतियों से जूझने के लिए उसे स्वार्थी और आत्मकेन्द्रित मत बनाइये, अगर वह अपना होमवर्क किसी बच्चो से शेयर करता है तो डांट का नहीं बल्कि प्रशंसा का हकदार है, बचपन की इसी भोली भाली दुनिया में वह सीख सकता है कि जीवन दूसरों की मदद करने और मदद लेने के मानवीय तंतुओं पर ही टिका है।
यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिये कि स्वार्थपरता और सिर्फ अपने बारे में सोचने की बात अगर उसके मन में घर कर गयी, तो इसका शिकार खुद उसके माता पिता भी हो सकते हैं, जीवन में जैसे-जैसे समझदारी का स्तर बढ़ता है, लोग इस तरह की शिकायतें भी खूब करते हैं कि अब इस जिंदगी में पहले जैसा मजा नहीं रहा।
ऐसा क्यों होता है कि बचपन और युवावस्था का आनंद विवाहित जीवन में प्रवेश और उम्र बढने के साथ जाता रहता है, यह भी एक सवाल है? ऐसी समझदारी किस काम की जिसकी वजह से जीवन में आनंद का भाव निरंतर कम होता जायें, इसी पृष्ठभूमि पर किसी ने बहुत खूबसूरत शेर कहा है "अच्छा है दिल के साथ रहे पासबाने अक्ल लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दें" यानी जिंदगी में दिल के साथ दिमाग का होना भी बहुत जरूरी है।
लेकिन कभी कभी सिर्फ दिल से काम लेना चाहिये, काफी हद तक इस बात में सच्चाई भी है कि दिमाग की उधेड़बुन जिन्दगी के आनंद से हमें दूर कर देती है, याद कीजिये उस निर्दोष बचपन को जो होमवर्क के गुंताड़े से दूर पतंगबाजी का जमकर लुत्फ उठाता है, घर लौटने पर माता पिता की पिटाई भी उस आनंद को कम नहीं करती है।
दूसरे दिन फिर मैदान में हाथ में चखरी लिए बच्चों की पतंग आसमान की बुलंदियों की छूती रहती थी, गिल्ली डंडे के साथ पूरा रविवार निकाल देते थे, इसी तरह युवावस्था में कॉलेज से भाग कर फिल्म देखना, देर रात तक चौराहों पर मित्रों के साथ चाय की चुस्कियों में जिंदगी के हर गम को घोल कर पी जाना और ठहाके लगाते रहने वाले बेफिक्र यौवन को भला कौन भूल सकता है।
उन बुजुर्गों की सभी तारीफ करते हैं, जिनके बारे में यह कहा जाता है कि उनकी उम्र जरूर बढ गयीं लेकिन दिल अभी भी जवान है, निस्संदेह ऐसे बुजुर्ग चुस्त दुरूस्त भी रहते हैं, और नई पीढी के साथ बेहतर संवाद कायम करने के साथ उनके बीच लोकप्रिय भी रहते हैं, सज्जनों! आइये अब इस बात को भी समझने की कोशिश करते हैं कि उम्र बढने के साथ व्यक्ति के भीतर क्या कुछ घटता है।
उम्र बढने के साथ शायद अधिकतर लोगों के भीतर संदेह, भय, असुरक्षा और मतलब परस्ती जैसे भाव भी बढते जाते हैं, जीवन में जब ढेर सारे नकारात्मक भाव एकत्र हो जाते हैं, तो वह आनंद पर कुंडली मार बैठ जाते हैं, एक उम्र के बाद अगर दोस्ती व्यक्ति के लिए सिर्फ समझौता हो जाये तो फिर मन की बातें वह किस मित्र से कहेंगा।
याद कीजिये जवानी का वह दौर जब कुछ भी अच्छा बुरा घटता था, तो और आप सीधे उसे शेयर करने के लिए अपने सबसे प्रिय मित्र के पास तुरंत पहुंचते थे, अब व्यक्ति के लिए किसी से कुछ शेयर करना तो दूर उसे यही डर लगा रहता है कि उसकी कोई अच्छी या बुरी बात किसी को पता न चल जाये, सभी ने महसूस किया है कि निश्छल व्यक्ति संत महात्मा और शुद्ध आचरण वाले लोगों के व्यक्तित्व में उनकी प्रौढ़ वय के बावजूद बचपन और युवावस्था के भाव बहुधा झलक जाते हैं, यही उनकी प्रसन्नता का राज है।
भले ही व्यक्ति की उम्र 40 साल हो और वह किसी कंपनी में शीर्ष पद पर हो, लेकिन कभी कभी छत पर जाकर बच्चे के साथ पतंग उडाने या किसी चौराहे पर चाट के ठेले पर गोलगप्पे खाने के लुफ्त से वंचित नहीं रहना चाहिये, काम का बोझ व्यक्ति की पीठ पर इस निर्मम तरीके से नहीं लद जाना चाहिये कि वो उसके बचपन और जवानी की सभी सुखद स्मृतियों को खुरच खुरच कर मिटा दे।
इस जिंदगी का हर हिस्सा अपने आप में संपूर्ण होता है, और उसका एक दूसरे के साथ अभिन्न संबंध होता है, जीवन में परिपक्वता की उम्र में प्रवेश करने के बाद बचपन और जवानी की रोमांचक और आनंद भरी दुनिया की तरफ रूख न करना ही व्यक्ति को पीडा से भरता है, और जीवन को मशीनी बनाता है।
व्यक्ति यह जरूर याद रखें कि जीवन में कैसे आगे बढना है, मकान की किस्त कब चुकानी है, बॉस को कैसे खुश रखना है, बीबी बच्चों के जीवन को कैसे खुशहाल बनाना है, और धनवान कैसे बनना है, लेकिन इन बातों के साथ यह भी याद रखें कि बचपन में उस कौन सी मिठाई पसंद थी, जवानी में किस गजल को सुन कर उसकी आँख से आँसू निकल पडते थे।
किस दोस्त के साथ बैठ कर उसे जीवन के वास्तविक आनंद की अनुभूति होती थी, यकीन मानिये ऐसा करने पर आप इस निराशावादी भाव से एकदम बाहर निकल आयेंगे, रूपया कमाने की मशीन बनने से अच्छा है अपनो को समय दिजिये, आपको आंतरिक खुशी होगी, वो खुशी रूपयों से भी महंगी है, जीवन जीने के लिये है, ढोने के लिये नहीं है।
जय श्री राधे!
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